झबरेड़ा, 11 जुलाई। झबरेड़ा कस्बा सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के पशुपालकों के सामने दुधारू पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान का असफल होना गंभीर चिंता का विषय बन गया है। गाय और भैंसों के समय पर गर्भधारण न करने के कारण क्षेत्र के किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिससे पशुपालकों में गहरा रोष है।

क्षेत्रीय किसान व पशुपालक शहीद अहमद, जमील अहमद, नेत्रपाल, विकास कुमार, प्रदीप कुमार, अवनीश कुमार, काला सिंह,सुशील सैनी ,राजेश और बाबूराम आदि का कहना है कि खेती के बाद पशुपालन ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। दूध बेचकर ही कई परिवार अपनी आजीविका चलाते हैं। सरकार पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो करती है, लेकिन धरातल पर योजनाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। कस्बे में स्थित एकमात्र राजकीय पशु चिकित्सालय से क्षेत्र के दर्जनों गांव जुड़े हैं, जिनमें प्रमुख रूप से झबरेडी, साबतवाली, डेलना, खजूरी, माजरा, खरखड़ी, सढ़ोली, कुशालीपुर, कोटवाल आलमपुर, शीतलपुर, लाठरदेवा, भरतपुर और भक्तोंवाली शामिल हैं। पशुपालकों का आरोप है कि इस मुख्य चिकित्सा केंद्र पर अक्सर जरूरी दवाइयों का टोटा रहता है। शासन के निर्देशानुसार पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए गांवों में जागरूकता चौपाल लगाई जानी अनिवार्य है, लेकिन क्षेत्र में शायद ही कभी ऐसी किसी विभागीय चौपाल का आयोजन किया गया हो। इस संबंध में जब झबरेड़ा पशु चिकित्सालय के प्रभारी डॉ. रविंद्र सिंह से बात की गई तो उन्होंने बताया कि किसी भी पशुपालक को यदि कोई समस्या है, तो वह सीधे पशु चिकित्सालय में आकर संपर्क कर सकता है। जिन पशुओं में गर्भाधान असफल हो रहा है, उन्हें गर्भाशय की आंतरिक साफ-सफाई और सही डॉक्टरी इलाज की आवश्यकता होती है। सही समय पर उपचार से यह समस्या दूर हो सकती है।पशुपालकों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र में नियमित रूप से पशु चिकित्सा चौपाल आयोजित की जाए और कृत्रिम गर्भाधान की गुणवत्ता में सुधार किया जाए ताकि किसानों को राहत मिल सके।





