झबरेड़ा 22 जून। कस्बा में बढ़ती आबादी के अनुपात में सरकारी सस्ते गल्ले राशन की दुकानें न बढ़ने के कारण स्थानीय निवासियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि सालों पहले जब कस्बे की आबादी बेहद कम थी, तब भी यहां राशन की दो ही दुकानें थीं और आज जब आबादी बढ़कर लगभग 15,000 के पार पहुंच चुकी है, तब भी दुकानों की संख्या जस की तस है। इसके चलते हर महीने राशन वितरण के समय दुकानों पर उपभोक्ताओं की लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं।

स्थानीय उपभोक्ताओं ऊषा सैनी,संतोष, सुमन ,कुसम, चाहती सैनी, रजनीश,रजत,भोला कुमार, जयपाल, राजकुमार, सचिन आदि का कहना है कि दुकानों की संख्या कम और कार्डधारकों की संख्या अत्यधिक होने के कारण राशन लेने के लिए सुबह से ही लाइनों में लगना पड़ता है। कई बार तो पूरा दिन लाइन में खड़े रहने के बाद भी राशन नहीं मिल पाता और अगले दिन दोबारा आना पड़ता है। इस अव्यवस्था के कारण सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं और मजदूरी करने वाले वर्ग को हो रही है, जिन्हें अपना कामधंधा छोड़कर दिनभर धूप और कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। कस्बा वासियों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले कुछ दशकों में झबरेड़ा की जनसंख्या में कई गुना इजाफा हुआ है। वर्तमान में लगभग 15 हजार की आबादी के लिए मात्र दो सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानें ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। नियमानुसार जैसे-जैसे आबादी और राशन कार्डधारकों की संख्या बढ़ती है, उसी अनुपात में नई दुकानें आवंटित की जानी चाहिए, लेकिन इस ओर खाद्य आपूर्ति विभाग और स्थानीय प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है।कस्बा वासियों का कहना है कि सालों पुराना ढर्रा आज भी चल रहा है। जब जनसंख्या कम थी, तब दो दुकानों से काम चल जाता था। लेकिन अब इतनी बड़ी आबादी को मात्र दो दुकानों से राशन बांटना अव्यावहारिक है। सरकार और प्रशासन को कस्बे में जनसंख्या के मानकों के आधार पर नई राशन की दुकानें स्वीकृत करनी चाहिए ताकि आम जनता को इस मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से राहत मिल सके। स्थानीय नागरिकों ने मुख्यमंत्री, जिला पूर्ति अधिकारी और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से मांग की है कि कस्बे की वर्तमान जनसंख्या का सर्वे करवाकर तुरंत राशन की नई दुकानें आवंटित की जाएं। नागरिकों का कहना है कि यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया और दुकानों की संख्या नहीं बढ़ाई गई, तो वे तहसील मुख्यालय पर प्रदर्शन करने को बाध्य होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन इस जनसमस्या को कितनी गंभीरता से लेता है और झबरेड़ा की जनता को इस कतार तंत्र से कब तक मुक्ति मिलती है।





